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भारतीय संस्कृति के संस्मरण सुमन*

  *समझदार बहू* शाम को गरमी थोड़ी थमी तो मैं पड़ोस में जाकर निशा के पास बैठ गई। उसकी सासू माँ कई दिनों से बीमार है। सोचा ख़बर भी ले आऊँ और बैठ भी आऊँ। मेरे बैठे-बैठे उसकी तीनों देवरानियाँ भी आ गईं। "अम्मा जी, कैसी हैं?" शिष्टाचारवश पूछ कर इतमीनान से चाय-पानी पीने लगी। फिर एक-एक करके अम्माजी की बातें होने लगी। सिर्फ़ शिकायतें, जब मैं आई तो अम्माजी ने ऐसा कहा, वैसा कहा, ये किया, वो किया। आधा घंटे बाद सब यह कहकर चली गईं कि उन्होंने शाम का खाना बनाना है। बच्चे इन्तज़ार कर रहे हैं। कोई भी अम्माजी के कमरे तक भी न गया। उनके जाने के बाद मैं निशा से पूछ बैठी, निशा अम्माजी, आज एक साल से बीमार हैं और तेरे ही पास हैं। तेरे मन में नहीं आता कि कोई और भी रखे या इनका काम करे, माँ तो सबकी है। उसका उत्तर सुनकर मैं तो जड़-सी हो गई। वह बोली, "बहनजी, मेरी सास सात बच्चों की माँ है। अपने बच्चो को पालने में उनको अच्छी जिंदगी देने में कभी भी अपने सुख की परवाह नही की सबकी अच्छी तरह से परवरिश की। ये जो आप देख रही हैं न मेरा घर, पति, बेटा, शानो-शौकत सब मेरी सासुजी की ही देन है। अपनी-अपनी स...

The Vedic Mathematics in the Dwarka Archaeology of Lord Krishna:

 भगवान कृष्ण की द्वारका का वैदिक-गणित: The Vedic Mathematics in the Dwarka Archaeology of Bhagwan Krishna:

अब्राहम सिडेनबर्ग जैसे विद्वान २०० वर्षों में एक बार पैदा होते हैं। अब्राहम सिडेनबर्ग हार्वर्ड विश्वविद्यालय में "गणित-इतिहास" के सम्मानित प्रोफ़ेसर थे। १९७८ में इनकी प्रकाशित शोध पत्र: "दी ओरिजिन ऑफ़ मैथमेटिक्स" (The Origin of Mathematics) ने धूम मचा दी।

सिडेनबर्ग कहते थे, यूनान का गणित, भारत से आयातित हैं, जो कम से कम ५००० वर्ष पुरानी है। मृत्यू पर्यन्त वैदिक गणित की प्राचीनता का उत्तर सिडेनबर्ग साहब को नहीं मिला। अतृप्त इच्छा लिए, १९८८ में मिलान नगर, इटली में इनकी मृत्यू हो गई।

अब्राहम सिडेनबर्ग सही थे। भगवान कृष्ण की द्वारका में वैदिक गणित के प्राचीन पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं। "शूल्व- सूत्र" वैदिक गणित का आधार है। "शूल्व- सूत्र" में रज्जू यन्त्र का प्रयोग किया जाता था। जिनके माध्यम से बहुत सारे ज्यामिति तथा वास्तु निर्माण के डिजाइन बनाये जाते थे।



"शूल्व- सूत्र", जिसमें बौधायन का "शूल्व- सूत्र" प्रमुख हैं, का जन्म, द्वारका से अत्यंत पहले के काल का है।

"शूल्व- सूत्र" के जानकार लोग ही ज्यामिति तथा वास्तु निर्माण कर सकते थे। इस चित्र में "शूल्व- सूत्र" की प्राचीन रज्जू यन्त्र से बनाई गई प्राचीन रेखा चित्र मिलती है।

हरिवंश पुराण, "रज्जू यन्त्र" के प्रयोग की सूचना द्वारका में होने की देता है। ये "शूल्व-रेखा" पीले तीर चिन्ह से बताई गई है। ये चिन्ह द्वारका नगर और नगर सीमा दीवार के बीच जमीन में खुदी हैं। ये चिन्ह द्वारका नगर में बहुतायत मिलती है। इस चिन्ह के पास प्राचीन द्वारका नगर की दीवार है। जहाँ समुद्र की लहरें आज भी टकराती हैं। न सिर्फ वैदिक गणित भारत से बाहर गया, अपितु भारत के लोग, उनकी संस्कृत भाषा और प्राचीन देवनागरी लिपि भी भारत से बाहर गई है। यह यूरोप के भारतवर्ष पर आर्य आक्रमण के सिद्धांत को एक ही झटके में हवा में उछाल देती है।

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