*समझदार बहू* शाम को गरमी थोड़ी थमी तो मैं पड़ोस में जाकर निशा के पास बैठ गई। उसकी सासू माँ कई दिनों से बीमार है। सोचा ख़बर भी ले आऊँ और बैठ भी आऊँ। मेरे बैठे-बैठे उसकी तीनों देवरानियाँ भी आ गईं। "अम्मा जी, कैसी हैं?" शिष्टाचारवश पूछ कर इतमीनान से चाय-पानी पीने लगी। फिर एक-एक करके अम्माजी की बातें होने लगी। सिर्फ़ शिकायतें, जब मैं आई तो अम्माजी ने ऐसा कहा, वैसा कहा, ये किया, वो किया। आधा घंटे बाद सब यह कहकर चली गईं कि उन्होंने शाम का खाना बनाना है। बच्चे इन्तज़ार कर रहे हैं। कोई भी अम्माजी के कमरे तक भी न गया। उनके जाने के बाद मैं निशा से पूछ बैठी, निशा अम्माजी, आज एक साल से बीमार हैं और तेरे ही पास हैं। तेरे मन में नहीं आता कि कोई और भी रखे या इनका काम करे, माँ तो सबकी है। उसका उत्तर सुनकर मैं तो जड़-सी हो गई। वह बोली, "बहनजी, मेरी सास सात बच्चों की माँ है। अपने बच्चो को पालने में उनको अच्छी जिंदगी देने में कभी भी अपने सुख की परवाह नही की सबकी अच्छी तरह से परवरिश की। ये जो आप देख रही हैं न मेरा घर, पति, बेटा, शानो-शौकत सब मेरी सासुजी की ही देन है। अपनी-अपनी स...
*जंबू वन*
एक था जंगल! बेहद घना ! इतना घना कि सूरज की किरणों को धरती चूमने में मशक्कत करनी पड़ती थी। भला ऐसी कौन सी प्रजाति थी जिसके पेड़ और पौधे वहां नहीं हो!! बरगद, पीपल, नीम, देवदार , अर्जुन जैसे छायादार पैडों से लेकर जामुन, आम, शहतूत, अमरूद, कटहल आदि फलदार पेड़ वहां लगे थे। इन पेड़ों की छाया में फूलों के पौधे भी पनपते थे। और तो और देसी बबूल भी बहुतायत में थे। जामुन के पेड़ों की बहुतायत के कारण इस जंगल को जंबूवन कहा जाता था। भिन्न भिन्न प्रजाति के बावजूद इन पेड़ों में कभी आपस में संघर्ष नहीं हुआ। अगर दो पेड़ों की शाखाएं आपस में टकरा भी जाती तो विचार विमर्श कर रास्ता निकाल लिया जाता।
आसपास के जंगलों का भी यही हाल था। परस्पर सह अस्तित्व की अवधारणा के आधार पर ही यह जंगल सदियों से टिके हुए थे।
और फिर इतिहास ने करवट ली। दूर रेगिस्तान में एक नवीन प्रजाति का जन्म हुआ। यह प्रजाति बबूल के पेड़ से ही जन्मी थी, लेकिन इसकी ऊंचाई ज्यादा नहीं थी । कांटे और पत्ते जहरीले थे, जिन्हें कोई भी जानवर खाना पसंद नहीं करता था। यह प्रजाति नीचे ही नीचे बढ़ती थी और बाकी पौधों और पेड़ों को लील जाती थी। इसे विलायती बबूल का नाम दिया गया।
जंबूवन के ठीक मध्य में एक बहुत बड़ा बरगद का पेड़ था, जिसकी जड़ें दूर दूर तक फैली हुई थी। हम जानते हैं कि पेड़ पौधे जड़ों के माध्यम से ही आपस में बातचीत करते हैं। उस दिन जंबूवन की सीमा पर स्थित देसी बबूलो की कतारों ने अपना संदेश भीतर तक पहुंचाया था। अपनी जड़ों के माध्यम से सभी पेड़ पौधे उस संदेश के बारे में बात कर रहे थे।
बरगद के पास स्थित पीपल ने कहा,"हमारे ऊपर बड़ा संकट आने वाला है! आसपास के सभी जंगल समाप्त हो गए हैं वहां सिर्फ और सिर्फ विलायती बबूल ही पनप रहा है। अब वह जंबूवन में भी आना चाहता है। अगर विलायती बबूल इस जंगल में आ गया तो उसके बाद हम सब का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा! सिर्फ वही बचेगा।
बरगद हंसा,'कैसी बेवकूफी की बात करते हो! इतना बड़ा जंबूवन! विलायती बबूल हमारा क्या बिगाड़ लेगा? आने दो उसे ! हमारे बीच आकर वह भी हमारे जैसा हो जाएगा।
और फिर हवाओं ने विलायती बबूल के बीज जंबूवन में भी बिखेर दिए।
कुछ ही वर्षों में जंबूवन के किनारों पर विलायती बबूल फैल चुका था।
फिर से जंबूवन में सभा हुई! जामुन ने अपनी बात रखी
"महाराज! इस वन के सीमावर्ती प्रदेश को विलायती बबूल ने पूरी तरह घेर लिया है। उसने वहां की सभी वनस्पतियों को स्वयं में समा लिया है। कुछ ही वक्त बाद यह पौधा सारे जंबूवन को स्वयं में समेट लेगा।"
बरगद ने हुंकारा भरा।
पीपल बोला,"हमें हमारे बबूलों को अनुमति देनी चाहिए कि वे इस पौधे को भीतर ना आने दे और उसे सीमा पर ही खत्म कर दें।
बरगद ने कुछ क्षण सोचा फिर बोला,"नहीं! हम शांतिपूर्ण सह अस्तित्व में विश्वास रखते हैं। हम किसी को नुकसान नहीं पहुंचा सकते। वह भी हमारा भाई है। उसकी पत्तियां भी हमारे जैसे ही हरी हैं। उसकी डालियां भी हमारी डालियों जैसी ही है। हमारे बीच आने के बाद हम उसे सिखाएंगे कि सबसे हिल मिलकर कैसे रहा जाता है।"
आम अब तक खामोश था। उसे अपने रसीले फलों का ख्याल आया। अब उससे रहा नहीं गया।
"लेकिन उसमें कांटे भी तो हैं। यहां आएगा तो बाकी पेड़ों को कांटे चुभेंगे।" ं
"हमारे जंगल के भी कई पेड़ों में कांटे हैं। क्या उन्होंने हमें नुकसान पहुंचाया है?"बरगद मानने को तैयार नहीं था।
"हमारे जंगल के कांटेदार वृक्षों से हम सुपरिचित हैं। लेकिन यह पौधा जहरीला है । इसने आसपास के सभी वनों को समाप्त कर दिया है। हमें उन वनों के पराभव से सबक लेना चाहिए।"नीम ने भी विरोध किया।
"हम विलायती बबूल के बीजों पर शांति और सहिष्णुता का अमृत बरसाएंगे, तो उन बीजों से जो पौधे पैदा होंगे उनमें न जहर बचेगा, न ही कांटे।" बरगद ने निर्णय किया।
जंगल के कुछ पेड़ बरगद के साथ सहमत हो गए । अन्य पेड़ों की असहमति खामोश हो गई।
कुछ ही वर्षों में जंबूवन में जगह-जगह विलायती बबूल के पौधे उग आए थे। जंगल के सभी पेड़ों ने उन पर प्यार की वर्षा की थी।
किंतु यह क्या? नवीन उगे पौधों पर वैसे ही कांटे थे जैसे उनके पूर्वजों के बदन पर थे! वे उतने ही जहरीले थे जितने आसपास के वनो के विलायती बबूल। हां लेकिन उन्होंने पूरी मासूमियत दिखाई ।जंगल के बाकी वृक्षों के साथ मिलनसारिता झलकाई। वे बड़े वृक्ष की जड़ों में अपनी जड़ घुसा कर उसका रस चूसते और इसे भाईचारे का नाम देते।
बरगद बहुत प्रसन्न था। उसने एक दिन अपने साथी वृक्षों से कहा।
"देखो मैं सही कहता था ना! यह हमारे बीच किस तरह हिल मिल गए हैं!"
बरगद की जड़ों से विलायती बबूल दूर रहे थे इसलिए बरगद को पता नहीं था कि बाकी जंगल में क्या हो रहा है।
पीपल खामोश रहा। वह धीरे-धीरे सूखता जा रहा था, क्योंकि उसकी जड़ों में से विलायती बबूल के पौधे जीवन रस चूस रहे थे। यही हाल बाकी वृक्षों का भी था। ऊपर से तो स्वस्थ नजर आ रहे थे किंतु भीतर ही भीतर खोखले हो चुके थे। आसमान से देखने पर पक्षियों को यह जंबूवन वैसा ही लगता था, जैसा पहले था किंतु इस वन की जड़ों पर विलायती बबूल का कब्जा हो चुका था । और तो और जम्मू वन के वृक्षों के बीच नवीन वृक्षों को जन्म नहीं दे पा रहे थे क्योंकि विलायती बबूल के बीज उन्हें उगने से पहले ही खत्म कर देते।
धीरे-धीरे जंबूवन के बाकी वृक्ष खोखले होते चले गए। जैसे-जैसे विलायती बबूल की संख्या बढ़ी वैसे वैसे उनकी उग्रता भी बढ़ने लगी। अब वे जबरन अन्य वृक्षों पर कब्जा करने लगे। वृक्षों के विरोध करने पर उन में अपने जहरीले कांटे चुभा कर अपनी बात मनवाते और उनका जीवन रस चूस लेते।
अभी भी जंबूवन के बाकी वृक्षों की संख्या विलायती बबूल से ज्यादा थी किंतु देखा जाए तो हर विशिष्ट प्रजाति की संख्या विलायती बबूल से बहुत कम थी। जब एक प्रजाति पर विलायती बबूल का हमला होता तो दूसरी प्रजातियां यह समझती कि शुक्र है हम बचे हुए हैं। यदि कोई वृक्ष आवाज भी उठाता तो विलायती बबूल मिलकर बरगद से गुहार लगाते कि हमारे साथ असहिष्णुता बरती जा रही है।हम डरे हुए हैं, हमारी रक्षा करो। फिर बरगद अपने साथियों के साथ मिलकर उस वृक्ष को गरियाने लगता ।
एक दिन तेज तूफान आया। तूफान की चपेट में आ जंबूवन के अधिकांश वृक्ष, जिनकी जड़ें जर्जर हो चुकी थी, नीचे गिर गए। सिर्फ बरगद और उसके दो चार साथी ही बचे रहे और बचे रहे सारे विलायती बबूल, क्योंकि उन्होंने बाकी वृक्षों से रस खींच खींच कर अपनी जड़ें बहुत मजबूत कर ली थी।
तूफान समाप्त होने के बाद बरगद की निगाहें जंबूवन के बाकी वृक्षों को ढूंढ रही थी, लेकिन दूर दूर तक विलायती बबूलों के अलावा कोई नहीं था, बस बचे थे बरगद के इर्द-गिर्द के दो चार वृक्ष।
कुछ ही दिनों में बरगद और उसके साथियों को विलायती बबूलों ने घेर लिया। अपने कांटे उनमें चुभाए और अपनी जड़ों से उनकी जड़ों को खाने लगे।
दर्द के मारे बरगद और उसके बचे खुचे साथी वृक्ष चिल्लाए, "हमने तो तुम्हारी जड़ों में प्रेम और भाईचारे का अमृत सींचा था, फिर भी तुम्हारे भीतर ज़हर और कांटे कैसे आ गए?"
विलायती बबूलों ने कोई जवाब नहीं दिया। वे बचे खुचे जंगल के विध्वंस में लगे रहे।
बरगद के पेड़ पर एक हंस का भी बसेरा था।
"विलायती बबूल के बीज को चाहे अमृत से भी सींच दो, पैदा तो वह विलायती बबूल ही करेगा, जिसमें अपने पुरखों के ही गुण होंगे। हे बरगद, इतनी सी बात तू समझ नहीं पाया। अब परिणाम भुगत!!"
इतना कह हंस दूसरे जंगल की तलाश में उड़ गया।
समाप्त

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