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भारतीय संस्कृति के संस्मरण सुमन*

  *समझदार बहू* शाम को गरमी थोड़ी थमी तो मैं पड़ोस में जाकर निशा के पास बैठ गई। उसकी सासू माँ कई दिनों से बीमार है। सोचा ख़बर भी ले आऊँ और बैठ भी आऊँ। मेरे बैठे-बैठे उसकी तीनों देवरानियाँ भी आ गईं। "अम्मा जी, कैसी हैं?" शिष्टाचारवश पूछ कर इतमीनान से चाय-पानी पीने लगी। फिर एक-एक करके अम्माजी की बातें होने लगी। सिर्फ़ शिकायतें, जब मैं आई तो अम्माजी ने ऐसा कहा, वैसा कहा, ये किया, वो किया। आधा घंटे बाद सब यह कहकर चली गईं कि उन्होंने शाम का खाना बनाना है। बच्चे इन्तज़ार कर रहे हैं। कोई भी अम्माजी के कमरे तक भी न गया। उनके जाने के बाद मैं निशा से पूछ बैठी, निशा अम्माजी, आज एक साल से बीमार हैं और तेरे ही पास हैं। तेरे मन में नहीं आता कि कोई और भी रखे या इनका काम करे, माँ तो सबकी है। उसका उत्तर सुनकर मैं तो जड़-सी हो गई। वह बोली, "बहनजी, मेरी सास सात बच्चों की माँ है। अपने बच्चो को पालने में उनको अच्छी जिंदगी देने में कभी भी अपने सुख की परवाह नही की सबकी अच्छी तरह से परवरिश की। ये जो आप देख रही हैं न मेरा घर, पति, बेटा, शानो-शौकत सब मेरी सासुजी की ही देन है। अपनी-अपनी स...

पितापुत्रकाअनोखारिश्ता

 पितापुत्रकाअनोखारिश्ता 

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भारतीय पिता पुत्र की जोड़ी भी बड़ी कमाल की जोड़ी होती है।

दुनियां के किसी भी सम्बन्ध में, अगर सबसे कम बोल-चाल है, तो वो है पिता-पुत्र की जोड़ी में....

एक समय तक दोनों अंजान होते हैं, एक दूसरे के बढ़ते शरीरों की उम्र से फिर धीरे से अहसास होता है हमेशा के लिए बिछड़ने का...!

जब लड़का, अपनी जवानी पार कर अगले पड़ाव पर चढ़ता है तो यहाँ इशारों से बाते होने लगती हैं  या फिर इनके बीच मध्यस्थ का दायित्व निभाने वाली माँ के माध्यम से...!

पिता अक्सर उसकी माँ से कहा करते हैं — "उससे कह देना।"

और....

पुत्र अक्सर अपनी माँ से कहा करता है — "पापा से पूछ लो ना।"

इसी दोनों धुरियों के बीच घूमती रहती है — माँ। 

जब एक कहीं होता है तो दूसरा वहाँ नहीं होने की कोशिश करता है, शायद पिता-पुत्र नजदीकी से डरते हैं।

जबकि....

वो डर नजदीकी का नहीं है, डर है उसके बाद बिछड़ने का । 

भारतीय पिता ने शायद ही किसी बेटे को कहा हो कि बेटा मैं तुमसे बेइंतहा प्यार करता हूँ।

पिता की अनंत गालियों का उत्तराधिकारी भी वही होता है, क्योंकि पिता हर पल जिन्दगी में अपने बेटे को अभिमन्यु सा पाता है।

पिता समझता है, कि इसे सम्भलना होगा, इसे मजबूत बनना होगा, ताकि जिम्मेदारियों का बोझ इसका वध नहीं कर सके। 

पिता सोचता है,जब मैं चला जाऊँगा, इसकी माँ भी चली जाएगी, बेटियाँ अपने घर चली जायँगी, रह जाएगा सिर्फ ये, इसे हर-दम हर-कदम परिवार के लिए, आजीविका के लिए, बहु के लिए, अपने बच्चों के लिए चुनौतियों से, सामाजिक जटिलताओं से लड़ना होगा।

पिता जानता है हर बात घर पर नहीं बताई जा सकती, इसलिए इसे खामोशी में ग़म छुपाने सीखने होंगे।

परिवार के विरुद्ध खड़ी हर विशालकाय मुसीबत को अपने हौंसले से छोटा करना होगा। ना भी कर सके तो खुद का वध करना होगा। 

इसलिए वो कभी पुत्र-प्रेम प्रदर्शित नहीं करता, पिता जानता है, प्रेम कमज़ोर बनाता है। फिर कई दफ़ा उसका प्रेम झल्लाहट या गुस्सा बनकर निकलता है। 

वो अपने बेटे की कमियों मात्र के लिए नहीं है, वो झल्लाहट है जल्द निकलते समय के लिए, वो जानता है, उसकी मौजूदगी की अनिश्चितताओ को। 

पिता चाहता है कहीं ऐसा ना हो इस अभिमन्यु का वध मेरे द्वारा दी गई कम शिक्षा के कारण हो जाये।

पिता चाहता है कि पुत्र जल्द से जल्द सीख ले, वो गलतियाँ करना बंद करे, क्योंकि गलतियां सभी की माफ हैं, पर मुखिया की गलतियां माफ नहीं होती।

यहाँ मुखिया का वध सबसे पहले होता है। 

फिर....



एक समय आता है जबकि पिता और बेटे दोनों को अपनी बढ़ती उम्र का एहसास होने लगता है, बेटा अब केवल बेटा नहीं, पिता भी बन चुका होता है, कड़ी कमजोर होने लगती है ।


पिता का बेटे को जल्द सब कुछ सिखा देने की लालसा और, बेटे की उस मूल भावना को नहीं समझ पाने के कारण, वो सौम्यता भी खो देते हैं।

यही वो समय होता है जब बेटे को लगता है कि उसका पिता गलत है।

बस इसी समय को समझदारी से निकालना होता है, वरना होता कुछ नहीं है, बस बढ़ती झुर्रियां और बूढ़ा होता शरीर जल्द बीमारियों को घेर लेता है। 

फिर....

सभी को बेटे का इंतजार करते हुए माँ तो दिखी पर पीछे, रात भर से जागा पिता नहीं दिखा, पिता की उम्र और झुर्रियां बढ़ती जाती हैं।

ये समय चक्र है, जो बूढ़ा होता शरीर है बाप के रूप में उसे एक और बूढ़ा शरीर झांक रहा है आसमान से, जो इस बूढ़े होते शरीर का बाप है।

कब समझेंगे बेटे, 

कब समझेंगे बाप, 

कब समझेगी दुनियां,

ये इतने भी मजबूत नहीं।


पता है क्या होता है उस आख़िरी मुलाकात में ? जब, जिन हाथों की उंगलियां पकड़ पिता ने चलना सिखाया था वही हाथ, लकड़ी के ढेर पर पड़े पिता को लकड़ियों से ढकते हैं, उसे घी से भिगोते हैं, उसे जलाते हैं।


ये कोई पुरुषवादी समाज की चाल नहीं थी, ये सौभाग्य नहीं है, यही बेटा होने का सबसे बड़ा अभिशाप भी है।


ये होता है,

हो रहा है, 

होता चला जाएगा।


जो नहीं हो रहा,और, जो हो सकता है, वो यह कि, हम जल्द से जल्द कह दें, हम आपस में कितना प्यार करते हैं।


हे मेरे महान पिता...!

मेरे गौरव,

मेरे आदर्श,

मेरा संस्कार मेरा स्वाभिमान,

मेरा अस्तित्व...

मैं न तो इस क्रूर समय की गति को समझ पाया,

और न ही आपको अपने दिल की बात कह पाया।।

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